विरासत महोत्सव में किर्गिस्तान के लोक कलाकारों का छाया जादू, सुर संगीत के आगे झूमे लोग…
लोक गायक यज्ञेश रायकर के गीत संगीत ने विरासत संध्या में फैलाया अपने सुरों और राग का जादू
शास्त्रीय संगीत में ओमकार दादरकर ने हासिल किया है शाही मुक़ाम….. नाम सुनते ही प्रशंसकों में उमड़ पड़ती है उमंग की लहर
श्रीलंकाई लोक गायक कलाकारों का फॉक साईलोनिया…..विरासत के हज़ारों शाही मेहमानों के लिए बना यादगार
किर्गिस्तान के कलाकारों ने प्रस्तुत किया हिंदुस्तानी गीत..गोरों की न कालों की….ये दुनिया है दिलवालों की….पर झूम उठे लोग
विरासत की संध्या में आज बतौर अतिथि के रूप में यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के अध्यक्ष-सह-प्रबन्ध निदेशक भूपेश एस. राहुल मौजूद रहे।
देहरादून – ओएनजीसी के डॉ. भीमराव अंबेडकर स्टेडियम में आयोजित किए जा रहे आज के विरासत साधना में देहरादून के विभिन्न प्रतिष्ठित स्कूलों और संस्थानों के प्रतिभाशाली युवा नर्तकों ने शास्त्रीय और पारंपरिक नृत्य शैलियों के माध्यम से अपनी सुंदरता, लय और कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रदर्शन किया। लतिका रॉय फ़ाउंडेशन और राफेल राइडर चेशायर इंटरनेशनल सेंटर के ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों ने दिल को छू लेने वाले सामूहिक कथक प्रदर्शन प्रस्तुत किए, जो समावेशिता और नृत्य के आनंद को खूबसूरती से दर्शाते थे। प्रत्येक प्रतिभागी ने उल्लेखनीय समर्पण के साथ प्रदर्शन किया, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सार दर्शाता था।आज की इस सांस्कृतिक विरासत साधना में प्रतिभाग करने वाले भिन्न-भिन्न स्कूलों के होनहार स्कूली बच्चों में क्रमशः लतिका रॉय फ़ाउंडेशन से आस्था, श्रुति, तुषार, पलक, कृष्णा और श्वेता रावत द्वारा समूह नृत्य (कथक) प्रस्तुत किया गया। राफेल राइडर चेशायर इंटरनेशनल सेंटर से ईशा, श्रेया, निकिता, सानिया बिष्ट, खुशी नेगी और श्वेता रावत ने भी शानदार समूह नृत्य (कथक) प्रस्तुत कर सभी का मन मोह लिया I इसके अलावा विरासत साधना में अनाहत अकादमी ऑफ कथक और योग से अदिति भट्ट का कथक नृत्य, ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी के हर्षिता मेहता ने भरतनाट्यम, देहरादून वर्ल्ड स्कूल नाथूवाला से सिद्धि भट्ट ने कथक, तरूण संगीत एवं विचार मंच की छात्रा शिवानी बौंसियाल ने भी कथक प्रस्तुत किया। यही नहीं,चिल्ड्रेन्स एकेडमी स्कूल से नव्या गुप्ता ने भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी।
लेडी इरविन सीनियर सेकेंडरी स्कूल, नई दिल्ली की आकांक्षा ने कथक, दून ब्लॉसम स्कूल से अर्पिता मेहरा ने कथक, निर्मल आश्रम ज्ञान दान अकादमी ऋषिकेश से वैष्णवी कोठियाल ने कथक, द ओएसिस से गौरी छिल्लर ने भरतनाट्यम, केंद्रीय विद्यालय ओएनजीसी से मंजिष्ठा ओली ने कथक, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज राजपुर रोड (आसरा) से रोशनी ने कथक, द एशियन स्कूल की चारवी पटवा ने कथक तथा ओलंपस हाई की छात्रा नविता कुंवर ने कथक की अद्भुत प्रस्तुति देकर मन मोह लिया। तत्पश्चात विरासत साधना के समन्वयकों सुश्री राधा चटर्जी और सुश्री कल्पना शर्मा ने सभी प्रतिभागी नर्तकियों को सम्मानित किया।
विरासत की संध्या में आज बतौर अतिथि के रूप में यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के अध्यक्ष-सह-प्रबन्ध निदेशक भूपेश एस. राहुल मौजूद रहे।
विरासत महोत्सव में किर्गिस्तान के लोक कलाकारों का छाया जादू, सुर संगीत के आगे झूमे लोग…
किर्गिस्तान के कलाकारों ने प्रस्तुत किया हिंदुस्तानी गीत..गोरों की न कालों की….ये दुनिया है दिलवालों की….पर झूम उठे लोग
विरासत महोत्सव में सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत किर्गिस्तान से आए लोक गायक कलाकारों द्वारा की गई अद्भुत एवं अनूठी प्रस्तुति के साथ प्रारम्भ हुई I यहां के महिला व पुरुष कलाकारों ने अपने सुर संगीत के माध्यम से अपने देश की संगीत कला का अनोखा एवं अद्भुत प्रदर्शन विरासत की संध्या में करके लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया I
किर्गिज़स्तान को किर्गिज़ गणराज्य के नाम से भी जाना जाता है, यह मध्य एशिया का एक ऐसा देश है जो अपने गणराज्य के इतिहास और संस्कृति के लिए जाना जाता है।
इसकी राजधानी बिश्केक है।
यद्यपि भौगोलिक रूप से अपने अत्यधिक पहाड़ी भूभाग से अलग-थलग किर्गिज़स्तान रेशम मार्ग और अन्य व्यापारिक मार्गों के माध्यम से कई महान सभ्यताओं के संगम पर रहा है। विभिन्न जनजातियों और कुलों द्वारा बसाए गए किर्गिज़स्तान की एक समृद्ध खानाबदोश संस्कृति है जिसमें इन सभी की कला, संगीत और नृत्य का सम्मिश्रण है। यह प्रसिद्ध लोक गायक कलाकार किर्गिज़स्तान के जलाल-अबाद शहर से हैं। वे किर्गिज़स्तानी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले एक ऑर्केस्ट्रा के रूप में आए हैं। इनके गायक कलाकारों के समूह में बारह लोक कलाकार हैं। इस ऑर्केस्ट्रा का नेतृत्व साबिरबायेव अमदिरासुल कर रहे हैं, उनके निर्देशन में प्रत्येक प्रदर्शन किर्गिज़ संगीत विरासत का एक सच्चा उत्सव बन जाता है। कोमुज़ एक प्रिय राष्ट्रीय वाद्ययंत्र है और उसका किर्गिज़ संस्कृति में एक विशेष स्थान है। वायलिन वादक, शमुरातोव नूरबेक, पारंपरिक किर्गिज़ तकनीकों को वायलिन की शास्त्रीय ध्वनि के साथ खूबसूरती से मिलाते हैं। अमदिरासुल स्वयं भी एक कुशल संगीतकार हैं,वे एक अन्य पारंपरिक किर्गिज़ वाद्ययंत्र, ‘चूर’ बजाते हैं। कोमुज़ के अलावा उउज़ कोमुज़ पर भी प्रस्तुति दी गई है। कलाकारों के इस समूह में कामत फ़ाज़िज़ अकर जैसे प्रतिभाशाली कलाकार शामिल हैं, जो दुम्बिरा बजाते हैं, और म्यनबायेव उनारबेक, जो कई अन्य वाद्ययंत्रों को कुशलता से बजाते हैं। तोकीवा दिनारा तायतोयाक और वायलिन दोनों में अपनी प्रतिभा का योगदान देती हैं, जबकि बकीत सातरोव डबल बेस और बकीत सोरोनबायेव कॉन्ट्राबास बजाते हैं। नाज़गुल कज़ाखोवा किर्गिज़ कयाख़्तौ में अत्यधिक कुशल हैं, जो हमारे प्रदर्शनों में एक अनूठा पन जोड़ता है। प्रसिद्ध कलाकार और किर्गिज़ संगीत परंपराओं के संरक्षक टोकटोमुरात ओस्मानालियेव का भी सम्मान प्राप्त है, जो असाधारण कुशलता से कोमुज़ बजाते हैं। एक अन्य प्रतिभाशाली कोमुज़ वादक निरलान ओमिरज़ाक जीवंत और उत्साही समूह को पूरा करते हैं।
लोक गायक यज्ञेश रायकर के गीत संगीत ने विरासत संध्या में फैलाया अपने सुरों और राग का जादू
विरासत की आज की संध्याकाल में प्रसिद्ध लोक गायक यज्ञेश रायकर द्वारा भी अपने वायलिन पर दी गई शानदार और गज़ब की प्रस्तुति ने सभी को दीवाना बना दिया I मशहूर वायलिन वादक यज्ञेश रायकर ने अपनी वायलिन के माध्यम से सांस्कृतिक संगीत की सुर-शैली को बहुत ही अनोखे अंदाज में सुरों से बाहर निकालते हुए सभी के मन हृदय को आनंदित कर डाला I यज्ञेश ने अपने गायन की शुरुआत राग मारू बीजद के साथ विलाम्बित एक ताल में ख्याल गायकी के बाद तीन ताल से की । तबले पर यज्ञेश रायकर जी के साथ शुभ महाराज, तानपुरा पर अभिज्ञान भट्ट और प्रज्ञा विवेक ने संगत दी।
वायलिन की दुनिया में तेजी से अपने कदम आगे बढ़ा रहे यज्ञेश रायकर भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में एक उभरते हुए कलाकार हैं। यज्ञेश ने बहुत कम उम्र में ही वायलिन की विद्या को सीखना और प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। वे प्रसिद्ध वायलिन वादक स्वर प्रदन्य पंडित मिलिंद रायकर के पुत्र और शिष्य हैं ,उन्हें गणसरस्वती किशोरी अमोनकर का मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। उन्होंने आनंद पेडणेकर और स्वर्गीय पंडित वसंतराव कडणेकर से गायन की शिक्षा ली है।
‘हृदयेश कला महोत्सव’, रजब अली खान महोत्सव इंदौर, पंडित जितेंद्र अभिषेकी महोत्सव गोवा जैसे बड़े संगीत समारोहों में उनकी उपस्थिति देखी गई है। उन्होंने विश्व सिएटल संगीत महोत्सव और सबसे प्रतिष्ठित संगीत शंकर दरबार महोत्सव, नांदेड़ और सवाई गंधर्व भीमसेन महोत्सव पुणे में भी अपनी वायलिन बजाने की कला को प्रदर्शित किया है।
शास्त्रीय संगीत में ओमकार दादरकर ने हासिल किया है शाही मुक़ाम….. नाम सुनते ही प्रशंसकों में उमड़ पड़ती है उमंग की लहर
भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में सुर संगीत और राग की दुनिया में गर्व से ऊंचा मुकाम हासिल करने वाले लोक गायक ओमकार दादरकर का नाम सुनकर शास्त्रीय संगीत के प्रेमियों एवं प्रशंसकों में उमंग के रूप में एक लहर सी दौड़ पड़ती है I ओंकार दादरकर जी ने राग जयजयवंती से शुरुआत की, उसके बाद उन्होंने राग जयजयवंती की एक रचना विलाम्बित एक ताल में और उसके बाद तीन ताल में दो छोटी रचनाएँ दर्शकों को सुनाई। उनके साथ हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र, तबले पर मिथिलेश झा और स्वर में सहयोग देते हुए मोईन खान जी, अभिज्ञान भट्ट ने तानपुरा बजाया I
इस लोकप्रिय शाही हस्ती ओमकार दादरकर का जन्म 30 जुलाई 1977 को मुंबई में हुआ था, दादरकर ‘मराठी नाट्यसंगीत’ के परिवार से हैं । उन्हें प्रारंभिक मार्गदर्शन अपनी चाची दिवंगत प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक माणिक वर्मा और उसके बाद राम देशपांडे से मिला। शास्त्रीय संगीत के लिए सीसीआरटी छात्रवृत्ति (दिल्ली) से सम्मानित होने के बाद उन्होंने दादर-माटुंगा सांस्कृतिक केंद्र में गुरु-शिष्य-परंपरा के तहत पंडित यशवंतबुआ जोशी से शिक्षा भी ग्रहण की । उन्होंने पूरे भारत के साथ-साथ अमेरिका, कनाडा और यूके में एक नियमित संगीत कार्यक्रम कलाकार के रूप में पहचान हासिल की। नेपाल और कनाडा में प्रतिष्ठित कार्यक्रमों के अलावा कोलकाता,दिल्ली और मुंबई में आईटीसी संगीत सम्मेलनों में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन कर प्रतिष्ठा हासिल की है। प्रतिष्ठित दरबार महोत्सव, यूके में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें व्यापक रूप से प्रशंसा भी मिली । पुरस्कारों की श्रृंखला में उन्हे वर्ष 2010 मे प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार मुख्य रूप से मिला I इसके अलावा और भी कई पुरस्कार उनके द्वारा प्राप्त करके भारतीय संगीत का नाम रोशन किया गया है I इसी के साथ उन्हे वर्ष 2009 में आदित्य विक्रम बिड़ला पुरस्कार से भी नवाज़ा गया I मुंबई के सहयोग से उन्हे चतुरंगा प्रतिष्ठान द्वारा दिए गए “चतुरंगा संगीत शिष्यवृत्ति पुरस्कार” से सम्मानित किया जा चुका है I
श्रीलंकाई लोक गायक कलाकारों का फॉक साईलोनिया….. विरासत के हज़ारों शाही मेहमानों के लिए बना यादगार
डांस और म्यूजिक की अनोखी प्रस्तुति ने दिखाया जमकर जलवा
विरासत संध्या की सबसे खूबसूरत व अदाकारी से भरपूर महफिल में श्रीलंकाई लोक कलाकारों द्वारा दी गई शानदार प्रस्तुति से विरासत महोत्सव झूम उठा I कार्यक्रम की शुरुआत तबला वादक थुरुथ संदीप और हारमोनियम वादक पं. धर्मनाथ मिश्रा जी की जुगलबंदी से हुई। इसके बाद श्रीलंकाई समूह ने सबारागामुवा नटुम नामक एक सुंदर नृत्य प्रस्तुत किया, जो श्रीलंका के सबारागामुवा प्रांत में पाई जाने वाली एक अनूठी शैली है। ये पारंपरिक नृत्य संरक्षक देवताओं को प्रसन्न करने और प्राकृतिक आपदाओं को दूर करने के अनुष्ठान के रूप में शुरू हुई एक प्रथा हैं जो आज भी जारी है। इसके बाद उन्होंने एक पारंपरिक लोरी प्रस्तुत की जिसमें माँ के प्रेम और स्नेह को दर्शाया गया था। इसके बाद उन्होंने श्रीलंका स्टाइल में हिंदी फिल्म के गीत गाए जिसमें ” ये शाम मस्तानी मदहोश किए जाए….” रही। अगली प्रस्तुति एक लोकगीत थी जो आशा, खुशी और भक्ति का प्रतीक है। यह किसानों और गाँव के लोगों के बारे में एक गीत है।
सालोनिया श्रीलंका लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य, जिसे ऐतिहासिक रूप से सीलोन के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण एशिया में एक द्वीपीय देश है। इसकी राजधानी कोलंबो है। यह कई संस्कृतियों, भाषाओं और जातियों का घर है। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इस देश की विरासत प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। इसके सुंदर परिदृश्य इसकी कला, संगीत और नृत्यों में दिखाई देते हैं। विभिन्न जातियों, भाषाओं और धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं ने इस समृद्ध और विविध समाज को जन्म दिया है।
चौबीस श्रीलंकाई कलाकारों की आज दी गई शानदार प्रस्तुति को जमकर सराहा गया I फोक सिलोनिया श्रीलंका विश्वविद्यालय के इंडो म्यूज़ियोलॉजी विभाग का एक समूह है जो पिछले 20 वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत सिखा रहा है। उनके कार्यक्रम में एकल वाद्य वादन और लोक विषयों पर आधारित समूह नृत्य शामिल हुए । कंदयान नृत्य (उदारता नतुम) का विकास कंदयान राजाओं के शासनकाल के दौरान हुआ था और इसका नाम ऐतिहासिक पहाड़ी राजधानी कैंडी के नाम पर रखा गया था। यह एक अत्यंत परिष्कृत और परिष्कृत नृत्य शैली है जिसे पारंपरिक रूप से ताल वाद्यों, विशेष रूप से गाटा बेराया ड्रम और छोटे झांझ (थलमपोटा) के साथ प्रस्तुत किया जाता है। जबकि पहाथा राता नतुम श्रीलंका के दक्षिणी तटीय मैदानों से उत्पन्न एक नृत्य है और सबारागामुवा नतुम श्रीलंका के सबारागामुवा प्रांत में पाई जाने वाली एक अनूठी शैली है। ये पारंपरिक नृत्य संरक्षक देवताओं को प्रसन्न करने और प्राकृतिक आपदाओं को दूर भगाने के अनुष्ठानों के रूप में शुरू हुए थे, जो आज भी जारी है। ये नृत्य अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों, समारोहों और त्योहारों के दौरान किए जाते हैं। प्रस्तुति में थारुथ संदीप राजपाकाहा द्वारा बजाए गए तबले की अद्भुत थाप से प्रशंसकों की खुशी में चार चांद लग गए।
प्रतिभाग करने वाले इन श्रीलंकाई कलाकारों में क्रमशः कोट्टा कंकनमगे प्रियंकिगा लकमाली,वडुवावेलगे निपुनि थरुशिकाकरुणारत्न,वुल्लापेरुमगे काविनी हिवीमारा,सिंगप्पुली अराचिगे चामल्का नायोमी, रत्नायका मुदियानसेलगे उदेशिका मधुभाशिनि करुणारत्न,विथाना पथिरानाहलगे गांगुली कवीश्वर, दासनायके संदुनी इशारा विक्रमसिंघे, हेट्टी अराचिगे चतुरंगा लक्षण परेरा,सिलांगगे मदुशा सेववंडी करुणारत्न, करागोडाविडाना गमागे वासना मधुवंती जयवर्धन, डैमेज डोना मदुशी मेथमिनी,मपालागामा वान्नियाराचिगे बिमाली मदुभाशी, हेगामा धनपाला मुदियान्सेलगे नेथमी विमाशा चंद्ररत्न, अथापत्थु मुदिअनसेलगे थिसारी धनंजना,पोद्दीवाला हेवेगे हिमाशा निपुनी लक्षणी, निश्शंका अराचिलागे उदारि चामोदिका, ओविटिगाला विथानगे चमारी बिमाली, थेन्नाकून मुदियानसेलगे निमेशिका थेन्नाकून,वन्निगमगे सारंगी माधुर्य, मल्लिया वेदकरयालागे दिलेक्षी प्रशनिका, मेदा गेदारा जयनि चतुरिका इन्द्रतिलका, हर्षा प्रगीथ मदुमल जगोड़ा, मलालरत्न सेनानायके मुदियानसेलगे अंजलि मेश बांदा तथा एम.के.थारूथ संदीप राजपक्षे शामिल हैं I
